सुबह -ए-बलिया
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एक जिला जहाँ पहुँचने पर सबसे पहला ख़्याल क्या आता है? ये वही जिला जहाँ से एक से बढ़कर एक वीर निकले जिनकी आभा से जिले को एक नई पहचान मिली .ये वही जिला है जो यूपी का होते हुए भी अपने में एक राज्य की संस्कृति को समाहित किये हुए है .ये वही जिला है जहाँ से निकले एक व्यक्ति ने अकेले दिग्गजों को पीछे छोड़ 'प्रधानमन्त्री ' की कुर्सी पर बैठा जो भरी मीटिंग में 'इंदिरा गांधी ' के समक्ष बिलकुल स्पष्ट रख देता था.ये वही जिला जहाँ से निकले कवि की कविता ने एक दूसरे जिले को उस कविता से व्यक्त कर दिया .इतनी सब बातों के बाद भी इस जिले का नाम आने पर मेरा तो एक ही ख़्याल आता है 'भृगु' बाबा की जय .ये जिला जिसे बागी बलिया कहा जाता है .'मंगल पाण्डेय' जैसे थाती वाले व्यक्ति की धरती है. अभी भी कुछ अधूरा सा है जिसके बिना इसकी पहचान अधुरी लग रही है ..........
इस जिले का नाम सुनकर मेरे मन में तो एक ही ख़्याल आता है .होगा कोई स्थान गंगा के किनारे दो पाटों के बीच होंगे ढ़ेर सारे गाँव .जहाँ एक तरफ के गाँव वाले दूसरे तरफ की मुनादी करते होंगे .ये तो बस ख़्याल था किसी सपने की तरह आया और चला गया हक़ीक़त तो इससे बिलकुल अलग ही है . लगता है भोर का सपना नहीं है क्योंकि लोग कहते है भोर का सपना सही होता है . बड़ा अच्छा लगता है गंगा के किनारे गाँव लेकिन बरसात के समय बुरा लगने लगता है सब कुछ डूब जाता है और सब उजाड़ हो जाता है .कही कुछ बचा खुचा रह जाता है तो उसके साथ आई महामारी और नई माटी जो तमाम घाव पर नमक की तरह होती है .लोग इस पार से अब उस पार नहीं जा रहें होंगे .सब कुछ ठहरा से जैसे लग रहा हो .मैं भी एक जगह ऐसे ही सुबह होते ठहर गया क्योंकि कभी इसी तरह का एक गाँव मेरे ख़्याल में था जो अब उजाड़ सा है ,अब कोई नाव लेके जाता होगा तो उसकी नाव किसी बर्तन मांझने वाली 'गुंजा' से नहीं टकराती होगी .न 'चन्दन ' की नाव बहाई जाती होगी .
